Jul 30, 2011

मांद में घुसकर लिया था बदला


क्रांतिकारी ऊधम सिंह की शहादत 31 जुलाई पर विशेष
ऊधम सिंह अनाथ थे और अनाथालय में रहते थे,लेकिन फिर भी जीवन की प्रतिकूलताएं उनके इरादों से उन्हें डिगा नहीं पाइ। उन्होंने 1919में अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर जंग ए आजादी के मैदान में कूद पड़े...

संजय स्वदेश

नई दिल्ली। भारत के महान क्रांतिकारियों की सूची में ऊधम सिंह का विशेष स्थान है,जिन्होंने जलियांवाला बाग नरसंहार के दोषी माइकल ओड्वायर को गोली से उड़ा दिया था । पंजाब में संगरूर जिले के सुनाम गांव में 26 दिसंबर 1899 में जन्मे ऊधम सिंह ने जलियांवाला बाग में अंग्रेजों द्वारा किए गए कत्लेआम का बदला लेने की प्रतिज्ञा की थी जिसे उन्होंने गोरों की मांद में ही घुसकर 21 साल बाद पूरा कर दिखाया।

पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओड्वायर के आदेश पर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड डायर ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में शांति के साथ सभा कर रहे सैकड़ों भारतीयों को गोलीबारी कर मौत के घाट उतार दिया था। जलियांवाला बाग की इस घटना ने ऊधम सिंह के मन पर गहरा असर डाला था और इसीलिए उन्होंने इसका बदला लेने की ठान ली थी।

ऊधम सिंह अनाथ थे और अनाथालय में रहते थे,लेकिन फिर भी जीवन की प्रतिकूलताएं उनके इरादों से उन्हें डिगा नहीं पाइ। उन्होंने 1919में अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर जंग ए आजादी के मैदान में कूद पड़े। जाने माने नेताओं डॉ.सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी के विरोध में लोगों ने जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन एक सभा रखी थी,जिसमें ऊधम सिंह पानी पिलाने का काम कर रहे थे। पंजाब का तत्कालीन गवर्नर माइकल ओड्वायर किसी कीमत पर इस सभा को नहीं होने देना चाहता था और उसकी सहमति से ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड डायर ने जलियांवाला बाग को घेरकर अंधाधुंध गोलीबारी कर दी।

अचानक हुई गोलीबारी से बाग में भगदड़ मच गई। बहुत से लोग जहां गोलियों से मारे गए वहीं बहुतों की जान भगदड़ ने ले ली। जान बचाने की कोशिश में बहुत से लोगों ने पार्क में मौजूद कुएं में छलांग लगा दी। बाग में लगी पट्टिका के अनुसार 120 शव तो कुएं से ही बरामद हुए। सरकारी आंकड़ों में मरने वालों की संख्या 379 बताई गई, जबकि पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोगों की इस घटना में जान चली गई। स्वामी श्रद्धानंद के मुताबिक मृतकों की संख्या 1500 से अधिक थी।

अमृतसरके तत्कालीन सिविल सर्जन डॉ. स्मिथ के अनुसार मरने वालों की संख्या 1800 से ज्यादा थी।ऊधम सिंह के मन पर इस घटना ने इतना गहरा प्रभाव डाला था कि उन्होंने बाग की मिट्टी हाथ में लेकर ओड्वायर को मारने की सौगंध खाई थी। अपनी इसी प्रतिज्ञा को पूरा करने के मकसद से वह 1934 में लंदन पहुंच गए और सही वक्त का इंतजार करने लगे। ऊधम को जिस वक्त का इंतजार था, वह उन्हें 13 मार्च 1940 को उस समय मिला जब माइकल ओड्वायर लंदन के कॉक्सटन हाल में एक सेमिनार में शामिल होने गया। भारत के इस सपूत ने एक मोटी किताब के पन्नों को रिवॉल्वर के आकार के रूप में काटा और उसमें अपनी रिवॉल्वर छिपाकर हाल के भीतर घुसने में कामयाब हो गए।

चमन लाल के अनुसार मोर्चा संभालकर बैठे ऊधम सिंह ने सभा के अंत में ओड्वायर की ओर गोलियां दागनी शुरू कर दीं । सैकड़ों भारतीयों के कत्ल के गुनाहगार इस गोरे को दो गोलियां लगीं और वह वहीं मौत का शिकार हो गया। अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के बाद इस महान क्रांतिकारी ने समर्पण कर दिया। उन पर मुकदमा चला और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। 31 जुलाई 1940 को पेंटविले जेल में यह वीर हंसते हंसते फांसी के फंदे पर झूल गया। ब्रिटेन ने 1974 में ऊधम सिंह के अवशेष भारत को सौंप दिए। ओड्वायर को जहां ऊधम सिंह ने मौत के घाट उतार दिया,वहीं जनरल डायर जिन्दगी की अंतिम घड़ी में बीमारियों से तड़प-तड़प कर 23जुलाई 1927को बुरी मौत मर गया।

घोटालेबाज गुरुजी


जनज्वार.तीन दशकों से भी अधिक समय का सफर तय कर चुके उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद के एक मात्र प्रतिष्ठित महाविद्यालय जेएनपीजी की शाख पर बट्टा लगने को है। शिक्षा के गुरूकुल में भ्रष्टाचार को पनाह दी जा रही है। यूं तो साल दर साल महाविद्यालय में प्राचार्य आते और जाते रहे मगर वर्ष 2003 से 31 जुलाई 2011 तक के कार्यकाल में रहे प्राचार्य ने जिस तरह से यूजीसी ग्रान्ट कमीशन,विधायक सांसद निधि से प्राप्त बजट को कौड़ियों के भाव कागज के आंकड़ों में गर्त कर दिया है। इसके खिलाफ महाविद्यालय से जुड़े रहे कई पूर्व छात्र संघ नेता भी भ्रष्टाचार के मामले को लेकर अनशन और धरना प्रदर्शन कर चुके हैं।


वर्ष 1964 से महाविद्यालय में छात्र-छात्राओं से ली जाने वाली काशनमनी नियमित जमा होती रही है और महाविद्यालय के छात्रों को डिग्री लेने के बाद टीसी कटवाने के समय वापस कर दी जाती थी। वर्ष 2003से मई 2011के बीच छात्रों से वसूली गई लाखों रूपये की काशनमनी को न तो छात्र-छात्राओं को वापस किया गया और न ही इस धनराशि को महाविद्यालय के कोष मे जमा किया गया है। नाम नहीं लिखने की शर्त पर महाविद्यालय के एक लिपिक ने बताया कि नये भवन के खेल मैदान में जो इलाहाबाद ग्रामीण बैंक को किराये पर जो भवन और हाल दिया गया है,उससे मिलने वाले हजारों रूपये का किराया भी प्राचार्य के निजी खर्चा में चला जाता है।

वहीं करोड़ों रूपयों की लागत से महाविद्यालय में बने हुये टीटी हॉल, बाउण्ड्रीवाल, छात्र संघ अध्यक्ष भवन, क्रीड़ा विभाग की बिल्डिंगों और पुराने भवन के निर्माण कार्य में बड़े स्तर पर धांधली हुई है। निजी सूत्रों की माने तो महाविद्यालय के साईकिल स्टैण्ड से ही हर साल तकरीबन 20 से 25 लाख रूपये की वसूली की जाती है। साइकिल स्टैण्ड की फीस देने वालों में सभी छात्र छात्रायें शामिल होते हैं फिर चाहें वह विकलांग हो या आंख से अन्धा।

इधर महाविद्यालय के पुस्तकालय भवन के पीछे लगाये गये पूर्व प्राचार्यों द्वारा पुराने वृक्षों को तत्कालिक प्राचार्य ने वन विभाग की सांठ-गांठ से जिस तरह रातों रात ठिकाने लगा दिया उसकी ही एक बानगी महाविद्यालय के मैदान में लगाये गये 82 हजार के पौधे जो आज बीएड आवासीय भवन की बिल्डिंग की भेंट चढ़ चुके हैं।

महाविद्यालय के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष सुशील त्रिवेदी ने प्राचार्य नन्दलाल शुक्ला के खिलाफ कम्प्यूटर शुल्क के नाम पर कम्प्यूटर संचालक द्वारा की गयी तकरीबन 52लाख की वसूली पर मोर्चा खोल दिया है और कई दिनों से राजनीतिक दलों के साथ अनशन और धरना प्रदर्शन पर थे। इधर हाईकोर्ट इलाहाबाद के शासनादेश के बाद से पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के शासन में शिक्षा निदेशक द्वारा नियुक्त किये गये प्रदेश में 13महाविद्यालयों के प्राचार्यों को उच्च न्यायालय ने अवैध नियुक्ति करार देते हुये महाविद्यालय से बाहर का रास्ता दिखा दिया था।

मगर जेएनपीजी कालेज के प्राचार्य और अन्य प्राचार्यों ने उच्चतम न्यायालय की शरण में जाकर बड़ी ही साफगोई से जिला प्रशासन और महाविद्यालय स्टाफ की आंखों में धूल झोंकने   की तैयारी कर दी है। मिली जानकारी के अनुसार में 11 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने अपने दिये एक अहम आदेश में 11 जुलाई को कार्य कर रहे प्राचार्य के मुताबिक ही महाविद्यालय की गतविधियां संचालित करने के आदेश दिये हैं। इस आदेश के मुताबिक प्राचार्य नन्दलाल शुक्ला के हटाये जाने के बाद प्राचार्य नियुक्त हुये डॉ0 एपी सक्सेना को ही उच्चतम न्यायालय के शासनादेश के मुताबिक प्राचार्य की कुर्सी पर होना चाहिए।

लेकिन सत्ता की दबंगई और अपने क्षेत्र प्रभाव के बल पर निलम्बित हुये प्राचार्य ने महाविद्यालय में  न ही पूर्व में हाईकोर्ट से निलम्बन के बाद प्राचार्य की कुर्सी छोड़ी और न ही अपना चार्ज किसी अन्य को लिखित रूप में हस्तांरित किया था,इसी बात का लाभ लेते हुये उन्होनें एक बार फिर जिला प्रशासन की शार्गिदी में प्राचार्य पद नही छोड़ने का पूरा प्रबन्ध कर लिया है।

इधर सामाजिक कार्यकर्ता आशीष सागर ने जनसूचना अधिकार 2005के तहत महाविद्यालय में वर्ष 2003 से 31 जुलाई 2011 तक प्राचार्य के कार्यकाल में किये गये तमाम तरह के कामों और निर्माण कार्यों की सूचना मांगी थी। उनके अनुसार तीस दिवस गुजर जाने के बाद भी जनसूचना अधिकारी ने सूचना उपलब्ध नहीं करायी। उन्होनें जिला उपभोक्ता फोरम जनसूचना अधिकारी,प्राचार्य पर 90 हजार रू0 का मुकदमा दायर किया है।


ब्लॉगर को बारह साल की क़ैद




ब्रिटेन में पाकिस्तानी मूल के एक नौजवान बिलाल ज़हीर अहमद को उनके ब्लॉग के कारण बारह साल की क़ैद हो गई है.बिलाल ने अदालत के सामने स्वीकार किया था कि उन्होंने इंटरनेट पर एक ब्लॉग लिखकर इराक़ युद्ध का समर्थन करने वाले ब्रितानी सांसदों को मार डालने की वकालत की थी.

उन पर अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि 23वर्ष के बिलाल ने एक वेबसाइट में ब्लॉग लिखकर लोगों को सांसदों पर हमला करने के लिए उकसाया था.इस वेबसाइट को अब अमरीकी अधिकारियों ने बंद कर दिया गया है.
बिलाल ज़हीर अहमद को सज़ा सुनाते हुए न्यायाधीश ने उन्हें “हमारे बीच रहने वाला ज़हरीला साँप” बताया और कहा कि “वो हमारी व्यवस्था के दिल पर चोट करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है.”

न्यायाधीश ने कहा, “इराक़ युद्ध पर हमारे जो भी विचार हों, लेकिन ये एक जनतांत्रिक देश है. आप ब्रिटिश नागरिक होने का दम भरते हैं लेकिन आपके सिद्धांत हमारे उन सिद्धांतों से एकदम उलट हैं जिन पर हम अपने देश में मानते हैं.”

बिलाल ने कंप्यूटर तकनॉलाजी की पढ़ाई की है और उनके पास ब्रितानी और पाकिस्तानी पासपोर्ट हैं.अभियोजन पक्ष ने कहा कि इस्लामी कट्टरवादी विचारों को फैलाने वाली वेबसाइट पर बिलाल ने लोगों को बताया था कि अपने इलाक़े के सांसद की जनता के साथ बैठकों के कार्यक्रम का पता कैसे लगाया जाए.

साथ ही उन्होंने एक ऐसी ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट का लिंक अपने ब्लॉग में दिया था जो चाक़ू बेचती है.मुझे अपनी भावनाओं पर क़ाबू पाना चाहिए था. मेरी बातें पूरी तरह अतार्किक थीं. मैं किसी सेल का हिस्सा नहीं हूँ.इसके अलावा उनके पास एक किताब की इलेक्ट्रॉनिक प्रतियाँ भी मिलीं जिसमें जिहाद में हिस्सा लेने के तरीक़े बताए गए हैं.

‘ज़ाद-ए-मुजाहिद: एक मुजाहिदीन के लिए ज़रूरी सामान’ नाम की किताब भी उनके पास से बरामद हुई.बिलाल ने ये ब्लॉग तब लिखा जब रोशनआरा चौधरी नाम की एक महिला को लेबर पार्टी के सांसद स्टीफ़न टिम्स की हत्या की कोशिश में सज़ा सुनाई गई थी.रोशनआरा चौधरी ने ईस्ट हैम क्षेत्र से सांसद टिम्स को एक मुलाक़ात के दौरान पेट में चाक़ू मार कर घायल कर दिया था.

बिलाल ने इस हमले के लिए रोशनआरा चौधरी की तारीफ़ की थी और कहा था कि इस उदाहरण का अनुसरण किया जाना चाहिए.इससे एक दिन पहले बिलाल अहमद ने फ़ेसबुक पर लिखा, “हमारी बहिन ने हम मर्दों को शर्मसार कर दिया है. हमें ये काम (सांसद पर हमला) करना चाहिए था.”


फिर उन्होंने मेट्रो अख़बार की वेबसाइट पर लिखा, “मैं मानता हूँ कि टिम्स सस्ते में छूट गए. जबकि जिस युद्ध के पक्ष में उन्होंने वोट दिया उसके कारण अनगिनत आम लोग मारे गए हैं.”गिरफ़्तारी के बाद उन्होने पुलिस अधिकारियों से कहा, “मुझे अपनी भावनाओं पर क़ाबू पाना चाहिए था. मेरी बातें पूरी तरह अतार्किक थीं. मैं किसी सेल का हिस्सा नहीं हूँ.” बिलाल ज़हीर अहमद को 10 नवंबर, 2010 को गिरफ़्तार किया गया था.

(बीबीसी से साभार)

अधिग्रहण कानून : आशंकाएं और उम्मीदें

किसानों-आदिवासियों के प्रतिनिधियों के भागीदारी के बगैर जो प्रस्ताव तैयार हुआ है वह कोई ऐसा जमीन अधिग्रहण कानून कैसे बना सकता है,जिसके बनने के बाद इन तबकों में रोष न हो...


अजय प्रकाश

 जमीन अधिग्रहण के खिलाफ देश  में व्यापक होते विरोध के मद्देनजर सरकार,संसद के मानसून सत्र में 1894से चले आ रहे भूमि अधिग्रहण विधेयक को नया प्रारूप देने की तैयारी में है। नये प्रारूप को लेकर सोनिया गांधी के अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय  सलाहकार परिषद्  (एनएसी) के कई सुझाव केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री को लगातार पहुंच रहे हैं,जिससे उन्हें लोककल्याणकारी भूमि अधिग्रहण कानून बनाने में सहुलियत हो।

इन सुझावों में जमीन मालिकों को निलामी रेट से छह गुना कीमत दिये जाने,ग्राम सभा के निर्णायक होने और अधिग्रहण के लिए 75फीसदी प्रभावितों के हस्ताक्षर पर अधिग्रहण की अनुमति को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भूमि अधिग्रहण मामलों में एनएसी कार्यसमूह के संयोजक हर्षमंदर के शब्दों में कहें तो ‘सरकार ने अधिग्रहण में अगर उपर्युक्त तीनों प्रावधान शामिल किये तो इस कानून में एक गुणात्मक परिवर्तन होगा।’

सरकार और उसके सहयोगी अधिग्रहण कानून को किस रूप में लागू करेंगे, यह तो आने वाले सत्र के बाद पता चलेगा,लेकिन पहले से मौजूद कानूनों में जनता की भागीदारी कितनी हो पा रही है,उसे देखें तो कुछ और ही कहानी सामने आती है। एक मामला झारखंड के पूर्व सिंहभूमि जिले का है, जहां 26मई को जादुगोड़ा इलाके में भाटिन यरेनियम माइंस के बीस साल पूरे होने पर एक्सटेंसन के लिए एक जनसुनवाई हुई।

यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (यूसीआइएल)के अधिकारियों ने क्षेत्र में माइक से प्रचार किया कि सुनवाई स्थानीय फुटबाल फील्ड में होगी,लेकिन जनसुनवाई कॉरपोरशन कर्मचारियों के कॉलोनी में हुई। सुनवाई के दौरान ग्रामीणों,मीडिया और जनांदोलनों से जुड़े लोगों ने जाने का प्रयास किया तो सुरक्षा बलों और निजी गार्डों ने उन्हें रोक दिया। राज्य प्रदुशण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जनसुनवाई पूरी हो गयी और 29 वर्श और कंपनी के लीज को बढ़ाने का फैसला बैगर प्रभावितों की सहमति के ले लिया गया।’

गौरतलब है कि यह एकतरफा फैसला एजेंसी एरिया में लिया गया जो पहले से ही पेसा  एक्ट के तहत आता है,जहां ग्राम सभा और लोगों की सहमति ही अधिग्रहण या कंपनी चलाने का अंतिम निर्णय होता है। झारखंड आर्गेनाइजेशन अगेंस्ट यूरेनियम के संयोजक जगत मांडी कहते हैं, ‘ये बर्ताव तब किया जब इस क्षेत्र में नयी कंपनी नहीं बनानी थी बल्कि एक्सटेंशन लेना था। अधिग्रहण और विस्थापन तो पहले ही हो चुका था।’

ये उदाहरण बताने के लिए काफी है कि पहले से बने कानूनों के अमल की क्या स्थिति है। सरकार अपनी जरूरतों के लिए किस तरह जमीन अधिग्रहण कर रही है इसका उदाहरण न्यूक्लीयर पॉवर कॉरपोरशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनसीपीआइएल)की ओर से हरियाणा के फतेहाबाद जिले के कुम्हारिया न्यूक्लीयर पॉवर प्रोजेक्ट के खातिर अधिगृहित की जा रही जमीन के मामले से समझा जा सकता है।

फतेहाबाद कलेक्ट्रट पर पिछले एक वर्श से किसान संघर्ष समिति जमीन न कब्जाई जाये,के खिलाफ धरना दे रही है। अबतक धरना स्थल पर आने वाले दो किसानों की मौत भी हो चुकी है। समिति के अध्यक्ष हंसराज सिवाच कहते हैं, ‘हमलोग हस्ताक्षर कर कितनी बार प्लांट के लिए जमीन नहीं देने की बात कह चुके हैं। जापान में आई सुनामी के बाद परमाणु संयंत्रों से रिसाव की घटना के बाद तो बिल्कुल भी नहीं। फिर भी सरकार अपने नोटिस पर कायम है।’

हरियाणा की इस छवि के उलट फिक्की ने भूमि अधिग्रहण को लेकर हरियाणा मॉडल को आदर्ष के रूप में पेष किया है। पूंजीपतियों की संस्था फिक्की के नवनियुक्त महासचिव ने भूमि अधिग्रहण के बारे में राय है कि ‘हम प्राकृतिक संसाधनों की ऑनलाइन नीलामी और अधिग्रहण के हरियाणा मॉडल अपनाने के पक्ष में हैं।’महासचिव के मुताबिक हरियाणा में परियोजनाओं के लिए कंपनियां सीधे किसानों से 70फीसदी जमीन खरीदती हैं और सरकार मात्र 25प्रतिशत जमीन कब्जा कर परियोजना के लिए कंपनी को हस्तांरित करती है। इसके अलावा हरियाणा के वे जिले जो एनसीआर जोन में आते हैं वहां 33 साल तक प्रति एकड़ 15हजार रूपये के हिसाब से जमीन मालिक को देने और प्रभावित परिवारों को नौकरी देने का प्रावधान है।

फिक्की महासचिव के दावे के बरख्स   किसानों के पक्ष को देखें तो वह मेल नहीं खाते। हरियाणा के अंबाला जिले में बन रहे ‘मॉडर्न इंडस्ट्रियल टाउनशिप’ के लिए अधिगृहित की जा रही 280एकड़ जमीन को लेकर जहां मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा का दावा है कि इस अधिग्रहण की मंजूरी एक लाख किसानों ने हस्ताक्षर के जरिये दी है,वहीं किसान संघर्श समिति बाखालसा ने इसे फर्जीवाड़ा करार दिया है।

अधिग्रहण को लेकर विवाद की दूसरी घटना सोनीपत राजीव गांधी एजुकेशन सिटी को लेकर है। 2006 में अधिगृहित की गयी इस इलाके की भूमि के बारे में सरपंच ओम सिंह कहते हैं, ‘सरकार को हमने पूरी जमीन देने का वायदा कभी नहीं किया था,इसलिए एक भी किसान ने अधिग्रहण के बदले आजतक मुआवजा नहीं लिया है।’

जमीन अधिग्रहण के विशालतम क्षेत्रों में खनन के वे क्षेत्र भी हैं जहां लोग लगातार अपनी जल, जंगल और जमीन से उजड़ने को मजबूर हैं। उजड़ने का खौफ और सरकार की पूंजीपतियों की सुविधापूर्ती वाले अधिग्रहण कानूनों की वजह के किसान-आदिवासी विद्रोह कर रहे हैं और माओवादी क्षेत्रों को मजबूती दे रहे हैं। बावजूद इसके सरकार अधिग्रहण नीतियों को बदलने को तैयार नहीं दिखती है। हाल ही में योजना आयोग के अध्यक्ष मोंटेक सिंह आहुलवालिया ने खनन क्षेत्रों की रॉयल्टी बढ़ाये जाने के सवाल पर कहा है कि ‘खनन का धंधा बड़े निवेष और जोखिम का है। वैसे में खनन कंपनियों के मुनाफे में स्थानीय लोगों की भागीदारी से विदेशी  निवेशक बिदक जायेंगे और निवेश  के भविष्य  पर भी खतरा उत्पन्न हो जायेगा।’

खनन क्षेत्र के विषेश जोन के रूप में ख्यात छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नया अतिक्रमण भारतीय सेना अपना ट्रेनिंग कैंप खोलकर करने जा रही है। एजेंसी एरिया का यह क्षेत्र जो कि पेसा एक्ट के तहत आता है, अबतक हुए इस क्षेत्र के अधिग्रहण की जरूरतों बेमेल हैं। सेना ट्रेनिंग स्कूल के लिए अबूझमाड़ के क्षेत्र में 4 हजार वर्ग मीटर जमीन का अधिग्रहण करने जा रही है। हालांकि अधिग्रहण के लिये स्थानीय आदिवासियों से कोई सहमति नहीं ली गयी। अबूझमाड़ क्षेत्र में सेना के कैंप बनाये जाने का कारण माओवादी इलाका होना है, जहां सरकारी तंत्र काम नहीं करता है।

संसद के मानसून सत्र में पेश होने जा रहे अधिग्रहण कानून के मद्देनजर देखें तो इससे किसी को ऐतराज नहीं होगा कि अंग्रेजी शासन काल 1894से चले आ रहे अधिग्रहण कानून में लोकतंत्र की मूलभावना के मुताबिक बदलाव हो। लेकिन सवाल यह है कि किसानों-आदिवासियों के प्रतिनिधियों के भागीदारी के बगैर जो प्रस्ताव तैयार हुआ है वह कोई ऐसा जमीन अधिग्रहण कानून कैसे बना सकता है, जिसके बनने के बाद इन तबकों में रोष  न हो।